बाबूलाल जी के बेटे के बहाने

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शशि शेखर
मुख्य संपादक हिंदुस्तान

 

दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर पर आज सुबह मेरी नजर एक अधेड़ होते शख्स पर पड़ी। वह मेरी ओर ही देख रहा था । यह सहज आँख मिल जाने से कुछ अलग था। उसकी नजरें जैसे कुछ पढ़ने का प्रयास कर रही थीं। होगा कुछ , मैंने सिर झटकने के भाव से सोचा और आगे बढ़ गया।

उस क्षण मालूम न था कि बात यहीं ख़त्म हो जाने वाली नहीं है ।

बोर्डिंग शुरू होने में कुछ देर थी, सोचा क्यों न Samsonite की नई रेंज देख लूँ। वे अपना बहुत-सा समान सिर्फ़ हवाई अड्डों पर रखते हैं । मैं सामान ढोने वाले सामान देखने में खो सा गया था की कानों से आवाज़ टकरायी आप शशि शेखर जी हैं? देखा, तो सामने वही व्यक्ति ! मैं अनुराग हूँ, बाबूलाल शर्मा जी का बेटा।

ओह! यह था उसकी कौतूहल भारी दृष्टि का रहस्य। मैं क्षण भर में 35 बरस पीछे लौट गया। उस समय के इलाहाबाद में, जो मेरी रगों में ख़ून के साथ बहता है, 122, टैगोर टाउन का वह फ्लैट, जो आज भी मेरे भावों में मेरा घर है। अल्लापुर में, जहाँ बाबूलाल जी रहते थे, उन दिनों में जब रसचर्चा के दौरान हम जमकर ठहाके लगाते थे। वे उम्र में बड़े थे पर हमारी छनती ख़ूब थी ।

अनुराग और उसकी बहन तब स्कूल जाते बच्चे थे । आज परिपक्क्व अनुराग सामने खड़ा था -हल्का-सा स्थूल , गंजा होता सिर और व्यवहार में आज के आला कार्यकारियों सी नफ़ासत। वह भी एक Multi National Company का HR Head है मिलकर अच्छा लगा । बाबूलाल जी नहीं रहे पर वे अपने संस्कार की पुख़्ता विरासत छोड़ गए हैं।

कभी विस्तार से लिखूँगा उनके बारे में, वे बेहतरीन इंसान थे ।

मैं जब उनसे मिला, तो वे माया में संयुक्त सम्पादक थे । मेरी उनकी परिस्थितियों में फ़र्क़ था । मेरी उम्र 22 वर्ष थी, उनकी 35 के आसपास। मेरा विवाह नहीं हुआ था और मैं अपने पिता के विशाल फ्लैट में रहता था । वे पास के मध्यवर्गीय मुहल्ले अल्लापुर के एक मकान में किरायेदार थे । बच्चे पढ़ रहे थे, जिम्मेदारियाँ बोझिल होती जा रही थीं। वह उदारीकरण से पहले का भारत था । कुछ ही पत्रकार ऐसे थे जो चार अंकों में वेतन पाते थे। उस दौर की पत्रकारिता की हक़ीक़तें आज से अलग और तल्ख़ थीं । उस ग़म ए दौरां में भी वे अलमस्त इंसान थे। अगर मैक्सिम गोर्की को याद करूँ, तो मेरे जीवन की राहों में जो चंद लोग ऐसे मिले, जिन्होंने सहजता से बहुत कुछ सिखा दिया, तो बाबूलाल जी उनमें सर्वोपरि हैं। मेरे कालम का नाम- आजकल उन्होंने ही सुझाया था।

सोचता हूँ, रोज़मर्रा की आपाधापी में हम कितना कुछ बिसराये रहते हैं! उसे याद करने के लिए किसी हवाई अड्डे पर , संयोगवश स्वर्गवासी मित्र के बेटे से मिलने की भला कितनी ज़रूरत है?

(फेसबुक से)

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