निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए ‘लिविंग विल’ को मान्यता देने का उच्चतम न्यायालय ने दिया संकेत

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डे टुडे टाइम्स ब्यूरो
नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने संकेत दिया कि वह निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेसिया) के मामलों में ‘लिविंग विल’ के क्रियान्वयन को मान्यता दे सकता है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शांति से मृत्यु जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। न्यायालय ने यद्यपि कहा कि पर्याप्त रक्षोपाय होने चाहिए और ‘लिविंग विल’ मेडिकल बोर्ड के इस प्रमाण पर आधारित होगा कि मरीज की कोमा की स्थिति अपरिवर्तनीय है।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र के नेतृत्व वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए गंभीर रूप से बीमार मरीज द्वारा लिविंग विल को मान्यता देने की मांग वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। ‘लिविंग विल’ वह दस्तावेज है जिसमें आप कहते हैं कि काफी बीमार होने की वजह से जब आप कोई फैसला करने की स्थिति में नहीं होते हैं तो आपकी तरफ से कौन सा चिकित्सकीय या कानूनी फैसला लिया जाये।पीठ में न्यायमूर्ति ए के सिकरी, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण भी शामिल थे।
पीठ ने कहा कि जीवन के अधिकार का मतलब मृत्यु का अधिकार नहीं है, हालांकि सम्मानजनक जीवन में निश्चित रूप से सम्मान के साथ मृत्यु शामिल होगा क्योंकि एक बार मेडिकल बोर्ड द्वारा इसकी पुष्टि किये जाने के बाद कि मरीज की कोमा की स्थिति अपरिवर्तनीय है एक अग्रिम निर्देश लागू होगा। पीठ ने कहा कि यदि मेडिकल बोर्ड इसे प्रमाणित करता है कि मरीज का स्वास्थ्य अपरिवर्तनीय है और उसे कृत्रित सपोर्ट के बिना जिंदा नहीं रखा जा सकता तो लिविंग विल की भूमिका आ सकती है।
केंद्र की तरफ से उपस्थित हुए अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल पी एस नरसिम्हा ने लिविंग विल को मान्यता दिये जाने का विरोध किया। याचिकाकर्ता एनजीओ ‘कॉमन कॉज’ के लिए पेश होने वाले अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि किसी मरीज से जीवन रक्षक उपकरण हटाने के लिए मेडिकल बोर्डो द्वारा निर्णय लेने में रक्षोपाय जरूरी हैं।

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